Tuesday, March 12, 2013

हथनीकुंड बैराज पर तीन हिस्सों में बंटता है यमुना का जल


सुरेंद्र मेहता

यमुनानगर में यमुना नदी में पड़े डिस्पोजल, बोतलें और कचरा। -सुरेंद्र मेहता
यमुनानगर, 11 मार्र्च। यमुना शुद्धिकरण योजना के तहत करोड़ों रुपये खर्च किये जाने के बावजूद आज भी यमुना का दूषित करने का क्रम जारी है। यमुना को दूषित होने से बचाने के लिए जहां वृंदावन से दिल्ली तक अभियान चलाकर संतों ने आवाज उठाई है वहीं हरियाणा विधानसभा के कई विधायक भी यमुना को प्रदूषित करने के कारणों का पता लगाकर विधानसभा अध्यक्ष को अवगत भी करवा चुके हैं। इस सबके बावजूद आज भी एक दर्जन से ज्यादा ऐसे स्थान हैं, जहां से फैक्ट्रियों का जहरीला पानी एवं शहर का गंदा पानी सीधे यमुना में डाला जा रहा है।
कालिंदी पर्वतमालाओं से निकल कर प्रयाग तक के तेरह सौ सत्तर किमी लंबे सफर पर निकली यमुना नदी अब अपना जीवन बचाने के लिए संघर्षरत है, क्योंकि इसकी जलधारा को जहां हथनीकुंड बैराज ने संकुचित करके रख दिया है, वहीं इसके निर्मल जल को फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी ने दूषित कर दिया है। विकास के उन्माद में धरती के सबसे बुद्धिमान प्राणी मानव ने ही इसके प्रवाह पर ग्रहण लगा दिया है, जिससे यमुना किनारे बसे करोड़ों-करोड़ों जन मानस की आस्था पर कुठाराघात होने लगा है।
अंग्रेजी हकूमत ने पहाड़ी क्षेत्रों के जल पर अंकुश लगाने के लिए वर्ष 1873 में यमुना नदी पर ताजेवाला हैड बनाया गया था। इस दौरान बारिश के दिनों को छोड़कर वर्ष के शेष दिनों में यमुना की जलधारा अपने पूरे अस्तित्व के साथ प्रयाग तक बहती रहती थी। लेकिन समय बदला और वर्ष 1995 में ताजेवाला हैड की जर्जर हालत को देखते हुए इसे कंडम घोषित कर दिया गया। जिसके बाद हिमाचल, यूपी, दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा ने यमुना नदी के जल पर अपना-अपना हक जताना शुरू कर दिया। इन राज्यों की हजारों हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने के लिए वर्ष 1996 में यमुना जल के बंटवारे को लेकर हथनीकुंड बैराज का निर्माण करने पर समझौता हुआ। यही वजह है कि इस फैसले के होने के बाद के दिन से ही यमुना के अस्तित्व पर संकट मंडरा गया।
शहर का सीवरेज और कूड़ा सीधे पश्चिमी यमना नहर (डब्ल्यूजेसी) में बहाया जा रहा है, यहां तक कि मरे पशुओं को भी नदी व नहर किनारे डाला जा रहा है जिससे यह नदी में तैरते आम देखे जा सकते हैं। यही पानी फिल्टर करके दिल्ली में पीने के लिए प्रयुक्त हो रहा है। वर्ष 2012 जून-जुलाई में हरियाणा विधानसभा की पब्लिक एकाउंट्स कमेटी (पीएसी) की टीम ने यमुनानगर का दौरा कर डब्ल्यूजेसी में गंदगी और सीवरेज डालने के लिए अधिकारियों को लताड़ लगाई थी। इसके बाद कुछ समय के लिए कूड़ा यमुना किनारे से उठा दिया गया, लेकिन सीवरेज का पानी ज्यों का त्यों डाला जा रहा है। शहर की औद्योगिक इकाइयों का गंदा व जहरीला पानी यमुना नहर में जाने से रोकने के लिए अदालती आदेश के बाद 13.71 करोड़ की लागत से 23 किलोमीटर लंबी डिच ड्रेन बनाई गई थी। इसमें प्रमुख औद्योगिक इकाइयों पेपर मिल (बिल्ट), स्टार्च मिल, हरियाणा डिस्टिलरी व सरस्वती शूगर मिल सहित अन्य इकाइयों का पानी डाला जाना था, लेकिन वर्ष 2009 में बनते ही डिच ड्रेन टूट गई। इसके बाद यह औद्योगिक कचरा बेरोकटोक डब्ल्यूजेसी में जाने लगा।

No comments:

Post a Comment